वाराणसी। काशी की माटी, गंगा की लहरें और गांव के खेत-खलिहान… इन सबकी खुशबू हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार लालजी पांडेय ‘अंजान’ के गीतों में साफ महसूस होती है। बनारस से उनका रिश्ता सिर्फ जन्मभूमि तक सीमित नहीं था, बल्कि काशी उनकी भाषा, सोच और रचनात्मकता का आधार थी। ‘खइके पान बनारस वाला’ और ‘मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी’ जैसे गीतों के जरिए उन्होंने बनारस की मस्ती और गंगा के प्रति आस्था को देश-दुनिया तक पहुंचाया।
गीतकार अंजान के पुत्र और प्रसिद्ध गीतकार समीर अंजान ने अपने पिता के जीवन, संघर्ष, रचनात्मकता और उनसे मिली सीख को साझा किया। उनके मुताबिक, पिता उनके लिए सिर्फ अभिभावक नहीं, बल्कि गुरु और मार्गदर्शक भी थे। जीवन में सफलता हो या संघर्ष, हर परिस्थिति में संतुलित रहना उन्होंने अपने पिता से ही सीखा।
संघर्ष के बाद हासिल किया सफलता का मुकाम
समीर अंजान बताते हैं कि उनके पिता ने लंबे संघर्ष के बाद वह मुकाम हासिल किया, जिसका सपना उन्होंने देखा था। हालांकि, सफलता का पूरा आनंद लेने के लिए उन्हें ज्यादा समय नहीं मिला। फिर भी उन्हें इस बात का संतोष था कि वह एक सफल गीतकार बनने का अपना सपना पूरा कर सके।
सरल स्वभाव और सीधे व्यवहार वाले अंजान को शायद उनके जीवनकाल में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। लेकिन उनके गीतों की लोकप्रियता आज भी उनकी प्रतिभा और लेखनी की ताकत का प्रमाण है। समीर के अनुसार, पिता की सबसे बड़ी सीख यही थी कि व्यस्तता के दौर में भी विनम्र रहें और काम की कमी के समय भी धैर्य न खोएं।
‘खइके पान बनारस वाला’ से दुनिया तक पहुंची काशी की पहचान
अंजान के गीतों में प्रेम और विरह के साथ समाज, देश और आम जनजीवन की संवेदनाएं भी दिखाई देती हैं। उनकी रचनाओं में जीवन का कोई न कोई दर्शन जरूर मिलता है। बनारस के प्रति उनका विशेष लगाव उनके गीतों में भी झलकता है।
फिल्म ‘डॉन’ का लोकप्रिय गीत ‘खइके पान बनारस वाला’ बनारसी मस्ती, ठसक और बेफिक्री की पहचान बन गया। वहीं, ‘मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी’ गीत ने गंगा के प्रति आस्था और आत्मीयता को सुरों में पिरोया। फिल्म ‘गोदान’ के गीतों में गांव, खेत-खलिहान और मिट्टी से उनका जुड़ाव दिखाई देता है।
भोजपुरी और हिंदी, दोनों भाषाओं में उन्होंने लोकसंस्कृति और जनजीवन को अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया। उनके गीतों में बनारस महज एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान बनकर सामने आता है।

गुरु की सीख और अमिताभ बच्चन के साथ का किस्सा
समीर अंजान ने अपने पिता के गुरु रुद्रकाशी जी से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग भी साझा किया। बताया जाता है कि गुरु उनसे कहते थे कि बनारस मत छोड़ो, तुम्हें हरिवंश राय बच्चन बना दूंगा। इस पर अंजान मजाकिया अंदाज में कहते थे, “मुझे क्या मालूम था कि मुझे हरिवंश राय बच्चन का साथ नहीं, अमिताभ बच्चन का साथ चाहिए।”
बाद में अमिताभ बच्चन अभिनीत कई फिल्मों में अंजान के गीतों ने लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित किए। उनके लिखे गीतों ने सिनेमा के पर्दे से निकलकर आम लोगों की जुबान पर अपनी जगह बनाई।
जल्द प्रकाशित होगी ‘मैं गंगा तट का बंजारा’
समीर अंजान ने बताया कि उनके पिता ने कविताओं की एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसका नाम ‘मैं गंगा तट का बंजारा’ है। वह इस पुस्तक को जल्द ही प्रकाशित कराने की तैयारी कर रहे हैं। यह पुस्तक अंजान की रचनात्मक दुनिया और काशी से उनके आत्मिक जुड़ाव को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी में जन्मे लालजी पांडेय ‘अंजान’ का 3 सितंबर 1997 को निधन हो गया था। लेकिन उनके गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। समीर के लिए पिता की सबसे बड़ी विरासत उनकी सादगी, जीवन-दर्शन और संघर्षों से लड़ने की सीख है।
अंजान भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीतों में काशी की आत्मा, गंगा की धारा और लोकजीवन की धड़कन आज भी सुनाई देती है। यही वजह है कि वक्त गुजरने के साथ उनके गीत पुराने नहीं होते, बल्कि हर पीढ़ी के साथ नए अर्थों में जीवित रहते हैं।
