वाराणसी। धर्म, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति की नगरी काशी एक बार फिर देशभर के संतों, धर्माचार्यों, विद्वानों और युवाओं के महासंगम की साक्षी बनने जा रही है। वाराणसी के सिगरा स्थित रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में 3 से 5 नवंबर तक तीन दिवसीय ‘संस्कृति संसद’ का आयोजन किया जाएगा। इस आयोजन में देश के करीब 100 संप्रदायों के तीन हजार साधु-संतों और सात हजार से अधिक युवाओं के शामिल होने की संभावना है। खास बात यह है कि इस बार आयोजन में युवाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है। संस्कृति, सनातन परंपरा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर यहां तीन दिनों तक व्यापक विचार-विमर्श होगा।
बाबा रामदेव से लेकर एकनाथ शिंदे तक, कई दिग्गज होंगे शामिल
संस्कृति संसद में राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक जगत की कई प्रमुख हस्तियां हिस्सा लेंगी। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक तथा केशव प्रसाद मौर्य कार्यक्रम में शामिल होंगे। इनके अलावा योगगुरु बाबा रामदेव, राम मंदिर निर्माण से जुड़े चंपत राय, रॉ के पूर्व निदेशक एनके सूद और हार्दिक पटेल भी आयोजन का हिस्सा बनेंगे।
कार्यक्रम में देश के 13 अखाड़ों के पदाधिकारी, विभिन्न संप्रदायों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में संत-महात्मा भी मौजूद रहेंगे। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगद्गुरु अविचल देवाचार्य और महामंत्री जितेंद्रानंद सरस्वती के अनुसार, तीनों दिन सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक मुख्य सत्र आयोजित किए जाएंगे। इन सत्रों में संत, धर्माचार्य, शिक्षाविद, वैज्ञानिक और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ अपने विचार रखेंगे।
जेन-जी कॉन्क्लेव में युवाओं की होगी सबसे बड़ी भागीदारी
इस बार संस्कृति संसद का सबसे खास आकर्षण जेन-जी कॉन्क्लेव होगा। आयोजन में देशभर से सात हजार से अधिक युवाओं ने पंजीकरण कराया है। कॉन्क्लेव में करीब 90 प्रतिशत वक्ता युवा होंगे, जबकि 10 प्रतिशत विशेषज्ञ और मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिका निभाएंगे।
इस मंच पर युवाओं को केवल वक्ताओं को सुनने का अवसर ही नहीं मिलेगा, बल्कि वे अपने सवाल भी रख सकेंगे और विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर खुलकर विचार व्यक्त कर सकेंगे। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ना है।
आयोजन के दौरान मनुस्मृति से जुड़े विवादों पर चर्चा के लिए समिति गठित करने और हिंदू आचार संहिता तैयार करने की योजना पर भी विचार किया जाएगा। इसके अलावा भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा से जुड़े विभिन्न समकालीन विषयों पर चर्चा होगी।

संस्कृति संसद में इन हस्तियों की भी रहेगी मौजूदगी
तीन दिवसीय आयोजन में पद्मश्री स्वामी प्रदीप्तानंद, विष्णु शंकर जैन, महंत रवीन्द्र पुरी महाराज, स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, चिदानंद सरस्वती, स्वामी ब्रह्मेशानंदाचार्य, मिलिंद परांडे और आलोक कुमार सहित कई प्रमुख हस्तियां शामिल होंगी।
इनके विचारों के माध्यम से धर्म, समाज, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाएगी।
संस्कृति उत्सव में दिखेगी देशभर की कला और परंपरा
संस्कृति संसद केवल विचारों और विमर्श तक सीमित नहीं रहेगी। इसके साथ भारतीय कला, संगीत और सांस्कृतिक विरासत का भव्य उत्सव भी आयोजित होगा। प्रतिदिन शाम 5 बजे से रात 9 बजे तक संस्कृति उत्सव में लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत, नृत्य और पारंपरिक कलाओं की प्रस्तुतियां होंगी।
इसमें बनारस के स्थानीय कलाकारों के साथ पुडुचेरी की मार्शल आर्ट्स टीम भी अपनी कला का प्रदर्शन करेगी। इसके अलावा राष्ट्रीय चित्रकला और फोटोग्राफी प्रदर्शनी में देश-विदेश के कलाकार भारतीय सभ्यता, तीर्थस्थलों और सांस्कृतिक विरासत को अपनी कलाकृतियों के माध्यम से प्रदर्शित करेंगे। रंगोली और बाल चित्रकला प्रतियोगिताएं भी आयोजन का हिस्सा होंगी।
काशी विश्वनाथ धाम में होगा महारुद्राभिषेक
संस्कृति संसद के मुख्य आयोजन से पहले 2 नवंबर को श्रीकाशी विश्वनाथ धाम में संत-महात्माओं द्वारा बाबा विश्वनाथ का महारुद्राभिषेक किया जाएगा। इसके साथ ही संस्कृति संसद और राज्य ललित कला अकादमी की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय चित्रकला शिविर भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
शिविर के दूसरे दिन 50 चित्रकारों के साथ बीएचयू, काशी विद्यापीठ सहित सात कॉलेजों के 40 से अधिक जेन-जी और जेन-अल्फा प्रतिभागियों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। पद्मश्री दुलारी देवी, श्याम शर्मा, अद्वैत गडनायक, राजेश यादव और श्रीलंका की सहाना इहतिसाम सहित कई कलाकारों ने इसमें हिस्सा लिया। मॉरीशस और बांग्लादेश के कलाकारों ने भी अपनी कलाकृतियों के जरिए सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित किया।
कुल मिलाकर, तीन से पांच नवंबर तक आयोजित होने वाली संस्कृति संसद में संतों का आध्यात्मिक अनुभव, विद्वानों का चिंतन और युवाओं की नई सोच एक मंच पर दिखाई देगी। काशी में होने वाला यह आयोजन भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और नई पीढ़ी के बीच संवाद का महत्वपूर्ण अवसर बनने जा रहा है।
