वाराणसी, 04 नवंबर 2026: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में प्राचीन भारतीय इतिहास, बौद्ध कला और पुरातात्विक विरासत को समर्पित पुस्तक ‘मास्टरपीस ऑफ भरहुत’ का विमोचन किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने पुस्तक के लेखक डॉ. सुद्युम्न आचार्य की उपस्थिति में इसका लोकार्पण किया। डॉ. आचार्य को भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रीय पंडित’ की उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है। यह पुस्तक मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित ऐतिहासिक भरहुत स्तूप की कला, स्थापत्य, इतिहास और सांस्कृतिक महत्ता को विस्तार से प्रस्तुत करती है।
कुलपति बोले- BHU जैसे संस्थान से जुड़ना सौभाग्य की बात
पुस्तक विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि वह स्वयं को बहुत सौभाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें बीएचयू जैसे पवित्र और प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़ने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा, “मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं कि मैं एक ऐसे पवित्र स्थान (बीएचयू) से जुड़ा हूं, जहां कई उल्लेखनीय और सार्थक कार्य हो रहे हैं।”
उन्होंने पुस्तक के महत्व और विषयवस्तु को भारतीय इतिहास एवं सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। इस तरह के अकादमिक प्रयास प्राचीन भारतीय ज्ञान, कला और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
क्या है भरहुत स्तूप का ऐतिहासिक महत्व?
मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित भरहुत भारत के महत्वपूर्ण प्राचीन पुरातात्विक स्थलों में शामिल है। यह स्थल अपने प्राचीन बौद्ध स्तूप और प्रारंभिक भारतीय बौद्ध कला के उत्कृष्ट नमूनों के लिए जाना जाता है। यहां से प्राप्त मूर्तियां, शिलालेख, रेलिंग और स्थापत्य अवशेष प्राचीन भारत की धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक जीवन और कलात्मक परंपराओं की जानकारी देते हैं।
पुस्तक में भरहुत स्तूप से प्राप्त इन पुरातात्विक अवशेषों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। इसके माध्यम से पाठकों को यह समझने का अवसर मिलता है कि प्राचीन भारत में बौद्ध कला और वास्तुकला किस प्रकार विकसित हुई।

रेलिंग और प्रवेश द्वारों की कलात्मक विशेषताओं पर प्रकाश
‘मास्टरपीस ऑफ भरहुत’ में स्तूप की रेलिंग और प्रवेश द्वारों पर उकेरी गई कलाकृतियों की विशेष चर्चा की गई है। इनमें दिखाई देने वाली कलात्मक बारीकियां उस समय के शिल्पकारों की रचनात्मक क्षमता और तकनीकी दक्षता को दर्शाती हैं।
पुस्तक में इन कलाकृतियों के ऐतिहासिक संदर्भों को समझाने के साथ यह भी बताया गया है कि भारतीय बौद्ध स्थापत्य के विकास में भरहुत का क्या योगदान रहा है। इसमें सर अलेक्जेंडर कनिंघम के पुरातात्विक कार्यों को भी विशेष स्थान दिया गया है। उन्होंने भरहुत स्तूप की पुनः खोज और उसके अवशेषों के दस्तावेजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
शुंग काल के शिलालेखों से मिलेगी ऐतिहासिक जानकारी
इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भरहुत से प्राप्त शिलालेखों का विश्लेषण है। ये शिलालेख शुंग काल की ऐतिहासिक परिस्थितियों और बौद्ध स्मारकों को मिलने वाले संरक्षण एवं राज्याश्रय के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
लेखक ने इन अभिलेखों के माध्यम से उस समय की धार्मिक गतिविधियों, स्मारक निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण की परंपराओं को समझाने का प्रयास किया है। पुस्तक में पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण और उनके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
विद्वानों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी होगी पुस्तक
चित्रों से समृद्ध यह पुस्तक इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और बौद्ध अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। इसका उद्देश्य भरहुत की ऐतिहासिक और कलात्मक विरासत को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारत की प्राचीन सांस्कृतिक उपलब्धियों से परिचित हो सकें।
कई गणमान्य अतिथि रहे मौजूद
इस अवसर पर भारत कला भवन के निदेशक प्रो. श्रीरूप रायचौधरी और उपनिदेशक डॉ. निशांत, पिलग्रिम पब्लिकेशन के श्री रामानंद तिवारी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सदाशिव द्विवेदी उपस्थित रहे। इनके अलावा प्रो. शारदिंदु तिवारी और प्रो. अभिमन्यु सहित अन्य गणमान्य लोग भी समारोह में शामिल हुए।
इस पुस्तक का विमोचन बीएचयू में भारतीय इतिहास, कला और पुरातात्विक विरासत से जुड़े अकादमिक एवं शोध कार्यों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
