JDU in UP: क्या जदयू का उत्तर प्रदेश में कोई सांगठनिक ढांचा है? बिहार की यह सत्तारूढ़ पार्टी पिछले दो दशक से उत्तर प्रदेश में पांव जमाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसे अभी तक निराशा हाथ लगी है। अगर एक्का-दुक्का कामयाबी मिली भी तो भाजपा के सहयोग से ही मिली। यह कोशिश तब से शुरू है जब नीतीश कुमार समता पार्टी के नेता था। जब नीतीश कुमार जैसे दिग्गज और अनुभवी नेता को उत्तर प्रदेश में कामयाबी नहीं मिली तो क्या राजनीति के नवप्रवेशी निशांत कुमार को सफलता मिलेगी?
क्या उत्तर प्रदेश चुनाव के जरिये निशांत बनेंगे बड़ा नेता?
31 अक्टूबर को जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा ने बनारस सम्मेलन का जिक्र करते हुए निशांत कुमार के लिए एक शब्द का प्रयोग किया था, ‘हमारे नेता’। यानी अब उन्हें पार्टी का ‘नेशनल लीडर’ प्रोजेक्ट करने की तैयारी है और उत्तर प्रदेश इसका लॉन्चिंग पैड बनेगा। लेकिन संजय झा ने निशांत कुमार के लिए बहुत कठिन राह चुनी है। उत्तर प्रदेश चुनाव, जदयू की दुखती रग है। अगर 2027 के विधानसभा चुनाव में निशांत के नेतृत्व में जदयू का प्रदर्शन पिछली बार की तरह जीरो बटा सन्नाटा रहा तो फिर उनके ‘लीडरशिप’ का क्या होगा? MLC चुनाव में 75 फीसदी हार के बाद उनके खाते में एक और हार जुड़ जाएगी। फिर उन्हें पार्टी के ‘नेता’ के रूप में स्थापित करना मुश्किल हो जाएगा।
2016 में नीतीश कुमार ने भी बनारस में ही किया था सम्मेलन
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर बनारस में जदयू का कार्यकर्ता सम्मेलन कितना कारगर होगा? ये कोई नयी पहल नहीं है। मई 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बनारस में ही जदयू का कार्यकर्ता सम्मेलन किया था। उस समय बिहार में शराबबंदी नयी-नयी लागू हुई थी। नीतीश कुमार ने शराबबंदी के नारे के साथ उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान की शुरुआत की थी। इसी समय बहुजन समाज पार्टी के नेता आर के चौधरी ने मायावती से बगावत कर BS4 संगठन के बैनर तले लखनऊ में एक रैली आयोजित की थी। यह रैली 26 जुलाई 2016 को हुई थी, जिसमें बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए लखनऊ पहुंचे थे।
लेकिन आखिरी वक्त में चुनाव से हट गये नीतीश
जनवरी 2017 में उत्तर प्रदेश की जदयू इकाई ने बनारस, मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर जिले के कुर्मी- कुशवाहा बहुल सीटों पर उम्मीदवार भी तय कर लिये थे। लेकिन अचानक नीतीश कुमार ने चुनाव से हटने का फैसला कर लिया। उस समय नीतीश कुमार, लालू यादव के साथ मिल कर सरकार चला रहे थे। वे उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने के लिए चुनाव मैदान में उतरे थे। लेकिन महागठबंधन के नेताओं ने नीतीश के सामने तर्क रखा कि उनके चुनाव लड़ने से यूपी में धर्मनिरपेक्ष वोटों का बिखराव हो सकता है, जो भाजपा के लिए फायदेमंद होगा। आखिरी वक्त में नीतीश कुमार ने 2017 का चुनाव नहीं लड़ा।

2022 में जदयू के सभी 27 प्रत्याशी हारे, अधिकांश की जमानत जब्त
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। हालांकि इस बार वे बिहार में भाजपा के साथ मिल कर सरकार चला रहे थे। भाजपा ने जब इस चुनाव में नीतीश कुमार को सीटें नहीं दीं तो वे नाराज हो कर अकेले लड़ गये थे। शुरू में उन्होंने 51 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी। लेकिन अंत में उन्होंने कुल 27 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिन्हें जदयू का सिंबल मिला था। इस चुनाव में उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता धनंजय सिंह को भी जदयू ने टिकट दिया था। लेकिन चुनाव में जदयू की शर्मनाक हार हुई। जीरो रिजल्ट रहा। अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी थी।
2002 में भाजपा के सहयोग से 2 सीट जीती थी समता पार्टी
नीतीश कुमार को उत्तर प्रदेश में कामयाबी तब मिली थी, जब भाजपा ने उनका साथ दिया था। 2002 के विधानसभा चुनाव में नीतीश की समता पार्टी ने भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था, जिसमें उनके दो विधायक चुने गये थे। गुन्नौर सीट (बदायूं) से अजीत कुमार ऊर्फ राजू यादव और मुबारकपुर सीट (आजमगढ़) से शंखलाल मांझी समता पार्टी के विधायक बने थे। 2007 में रारी विधानसभा सीट (जौनपुर) से बाहुबली धनंजय सिंह जदयू के विधायक बने थे।
भाजपा के सहयोग से जदयू ने एक लोकसभा सीट भी जीती
2004 के लोकसभा चुनाव के समय नीतीश कुमार और शरद यादव मिल कर जदयू बना चुके थे। जदयू राष्ट्रीय स्तर पर NDA का हिस्सा था। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जदयू को उत्तर प्रदेश में 3 सीटें (आंवला, मेरठ और सलेमपुर) दी थीं। इनमें से आंवला सीट पर जदयू के उम्मीदवार कुंवर सर्वराज सिंह विजयी हुए थे। उत्तर प्रदेश से लोकसभा चुनाव में जदयू की यह इकलौती जीत है।
2012 में जदयू को 0.36 फीसदी वोट
यानी नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का उत्तर प्रदेश चुनाव में अकेले कोई अहमियत नहीं है। बिना भाजपा के सहयोग के उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है। जैसे 2012 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने भाजपा के खिलाफ जा कर अकेले लड़ा था। 403 सीटों में 209 सीटों पर नीतीश कुमार ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। सभी 209 सीटों पर जदयू के उम्मीदवार बुरी तरह हार गये। खाता भी नहीं खुला। जहां तक वोट प्रतिशत की बात है तो वह भी मात्र 0.36 फीसदी रहा।
2022 में जदयू का वोट शेयर मात्र 0.11 फीसदी
2022 के चुनाव में भी नीतीश कुमार के सभी 27 प्रत्याशी यूपी चुनाव हार गये। इस बार वोट शेयर 0.11 फीसदी रहा। यानी भाजपा के बिना जदयू को उत्तर प्रदेश में 1 फीसदी वोट भी नहीं मिला है। जब नीतीश कुमार अपनी राजनीति के शीर्ष पर थे, तब तो वे उत्तर प्रदेश में फेल रहे। अब पता नहीं किस आधार पर निशांत कुमार को उत्तर प्रदेश के जरिये ‘बड़ा नेता’ बनाने की कोशिश की जा रही है।
