हर 3 सेकंड में घुटता एक बचपन, आज भी नासूर बना है बाल विवाह, ग्लोबल मंच पर गूंजी भारत की आवाज

International Girl Child Day 2026: दुनिया के कई हिस्सों में कम उम्र की बच्चियों को स्कूल भेजने के बजाय उनकी झोली में घर-परिवार की जिम्मेदारी डाल दी जाती है. उनसे उनकी मर्जी तक नहीं पूछी जाती. बाल विवाह सिर्फ कम उम्र में होने वाला सामाजिक बंधन नहीं है, बल्कि यह एक मासूम के बचपन, उसकी पढ़ाई, सेहत और फैसले लेने का अधिकार छीनने वाली सबसे बड़ी दीवार है. हर साल 11 अक्टूबर को मनाया जाने वाला ‘अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस’ इसी सच्चाई पर रोशनी डालता है.

इस साल अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस की थीम है- ‘बाल विवाह खत्म करें और लड़कियों के अधिकारों में निवेश करें.’ संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े डराने वाले हैं. दुनियाभर में हर साल 1.2 करोड़ से अधिक लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है. इसका मतलब है कि हर 3 सेकंड में एक लड़की का बचपन जबरन बड़ों की दुनिया में धकेल दिया जाता है. इससे साबित होता है कि तमाम सख्त कानूनों के बावजूद यह कुप्रथा आज भी समाज के माथे पर बड़ा कलंक बनी हुई है.

कानून के साथ सोच बदलना भी है जरूरी

बाल विवाह को गरीबी या पुरानी परंपराओं से जोड़कर देखना काफी नहीं है. कम उम्र की शादी लड़कियों से उनका भविष्य छीन लेती है, उन्हें आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर बनाती है और कई बार मातृत्व या घरेलू हिंसा जैसे खतरों के मुंह में धकेल देती है. इस दलदल से बचाने के लिए केवल फेरे रुकवा देना काफी नहीं है. असली चुनौती शुरू होती है जब शादी रुकने के बाद उस लड़की की जिंदगी को नई राह देनी होती है. क्या वह स्कूल जा पाई? क्या उसे अपने पैरों पर खड़े होने का मौका मिला?

ग्लोबल मंच पर गूंजी भारत की आवाज

बाल विवाह के नासूर के खिलाफ ग्लोबल स्तर पर लड़ाई लड़ने में भारत भी आगे है. बाल अधिकारों के लिए लंबे समय से आवाज उठाने वाले जाने-माने अधिवक्ता भुवन रिभु (संस्थापक, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन) ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर बाल विवाह के खात्मे के लिए एक समर्पित अंतरराष्ट्रीय दिवस तय करने की मांग रखी थी. उनकी मुहिम और कई देशों के सहयोग का असर रहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हर साल 27 नवंबर को बाल और जबरन विवाह के खिलाफ ‘अंतरराष्ट्रीय दिवस’ के रूप में मनाने का प्रस्ताव पास कर दिया.

इस बारे में अधिवक्ता भुवन रिभु कहते हैं-

बाल संरक्षण को केवल किसी एक अपराध के खिलाफ कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जा सकता. इसके लिए नीति, संस्थागत व्यवस्था, अधिकारियों की क्षमता, समुदायों की भागीदारी, आर्थिक उपाय और तकनीक को एक साथ इस्तेमाल करना होगा. कानून का असली मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना है.

अब बदलने होंगे समाज के पैमाने

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस का संदेश बेहद साफ है- किसी भी लड़की का भाग्य उसकी उम्र या लिंग तय नहीं कर सकता. बाल विवाह का अंत तभी संभव है जब हम उस दबी-कुचली सोच को बदल दें, जो एक बच्ची के सपनों से ज्यादा उसकी शादी को जरूरी मानती है. जब लड़की के हाथ में किताबें होंगी और आंखों में आसमान छूने के सपने, तभी समाज का असली विकास संभव हो पाएगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *