Varanasi MLC Election: काशी में BJP की हार के पीछे कौन से फैक्टर रहे हावी? जानिए पूरा विश्लेषण

Varanasi MLC Election: यूपी के 11 विधान परिषद चुनाव के नतीजे अब सबके सामने हैं। राजनीतिक पार्टियों के लोग इसे 2027 का सेमीफाइनल बता रहे हैं। पूरे प्रदेश में 11 सीटों में छह पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की तो वहीं 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की। लेकिन सबसे चौंकाने वाले नतीजे वाराणसी के रहे। वाराणसी के स्नातक और शिक्षक दोनों ही खंडों पर सपा ने जीत दर्ज की है।

एक दौर में बीजेपी का गढ़ रहे किले में समाजवादी पार्टी ने कैसे सेंध लगाई? क्या आगामी 2027 के चुनावों पर इसका कोई असर होगा? बैलट से हुए चुनाव नतीजों से ईवीएम और चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों का क्या होगा?

जातिगत समीकरण साधने में बीजेपी हुई फेल

आपको जानकारी के लिए बता दे कि वाराणसी एमएलसी चुनाव में भाजपा की हार के मुख्य कारण आंतरिक गुटबाजी, गलत प्रत्याशी चयन और जातिगत असंतुलन रहे। केंद्र और राज्य में लंबे समय से सरकार होने के कारण संगठन में गुटबाजी पनपी है।

‘स्थानीय कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष’

शिक्षक सीट पर बाहर से लाए गए प्रमोद मिश्रा को टिकट देने से स्थानीय कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष पैदा हुआ। इसके साथ ही सपा के मजबूत प्रत्याशी लाल बिहारी यादव के सामने बीजेपी के प्रत्याशी कमजोर साबित हुए। मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के वीडियो का विपक्ष द्वारा किया गया प्रचार भी नुकसानदेह रहा।

‘बीजेपी का कोर वोटर उदासीन’

स्नातक सीट पर बीजेपी ने उम्रदराज राजपूत प्रत्याशी केदारनाथ सिंह को उतारा, जिनकी सक्रियता की कमी से कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं दिखा। वहीं दूसरी तरफ, सपा ने युवा कायस्थ अधिवक्ता आशुतोष सिन्हा को टिकट देकर कचहरियों में प्रभावी कायस्थ वर्ग को अपने पक्ष में साधा। कायस्थ, खत्री या भूमिहार जैसी अन्य अगड़ी जातियों की उपेक्षा से भाजपा का कोर वोटर उदासीन हो गया। प्रबुद्ध और शिक्षित वर्ग के बीच घटता जनाधार बीजेपी और संघ के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

जमीनी कार्यकर्ताओ की उपेक्षा और नाराजगी बड़ी वजह

बनारस में शिक्षक या स्नातक चुनाव में भाजपा को मिली हार कोई टॉप सिक्रेट नहीं रही। इस बात पर कल से ही चर्चा शुरू हो गई कि बीजेपी की हार के कौन-कौन से कारण हैं। जितने मुंह उतनी बातें। लेकिन इस चुनाव में जो सबसे महत्वपूर्ण बात उभरकर आई वो थी कार्यकर्ताओं की नाराजगी। उनमें वो जूनून नहीं दिखा जो सामान्यत: चुनाव में दिखता है।

‘बीजेपी कैंडिडेट के लिए आसान नहीं थी राह’

यह बात अलग है कि प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में इस बात की चर्चा शुरू हो गयी थी कि जिन्हें मैदान में उतारा गया है उनके लिए राह आसान नहीं होगी। अब बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में ऐसा क्यों हुआ। जबकि हर निर्वाचित पद पर बीजेपी का ही कब्जा है। क्या कमी थी। शिक्षक हो या स्नातक मतदाता सभी में संघ और बीजेपी की मजबूत पकड़ है। बात घूमकर फिर संगठन पर ही आ जाती है।

‘संगठन ने ठीक तरीके से कार्यकर्ताओं को नहीं दिया चार्ज’

इन जिलों में भाजपा संगठन ने ठीक तरीके से कार्यकर्ताओं को चार्ज नहीं किया। जिससे कार्यकर्ता वोटरों को बूथ तक ले जाने के लिए उत्साहित नहीं दिखे। मतदान केंद्र के बाहर लगे उनके कैम्प मतदान के दिन ही इस बात की गवाही दे रहे थे। जबकि इससे उलट सपा ने पहले ही यह तय कर लिया था कि उसे अपनी दोनों सीटें हर हाल में बरकरार रखनी हैं। वह अपनी पार्टी की वैचारिकी के हिसाब से ही वोट बनाने के काम में जुटे थे। सपा इसके चलते आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत नरेटिव खड़ा करना चाहती थी, जिसमें वह कामयाब भी हुई।

सपा का मत प्रतिशत भी बढ़ा

सिर्फ इतना ही नहीं हुआ बल्कि पिछले विधान परिषद चुनाव की तुलना में सपा का इस चुनाव में मत प्रतिशत भी बढ़ा है। इससे सपा बीजेपी के इस दावे को भी खारिज करती है कि पिछले चुनाव में भी दोनों सीट सपा के पास ही थी। लेकिन बीजेपी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि सपा के इस नरेटिव को ध्वस्त करने के लिए उन्होंने क्या किया। जबकि प्रदेश और केंद्र सरकार उनकी है। संगठन भी बाकी दलों की तुलना में बहुत ही मजबूत है। संसाधनों का भी कोई अभाव नहीं है।

‘जीत की रीढ़ कार्यकर्ता होता है’

जिस क्षेत्र के सांसद देश के प्रधानमंत्री हों और जिस क्षेत्र में हजारों करोड़ के विकास के कार्य हुए और हो रहे हो वहां ऐसी हार क्यों? जवाब एक ही समझ में आता है, हर दल में जीत की रीढ़ कार्यकर्ता ही होता है और जब वह निराश होता है तो परिणाम बदल जाते हैं। मेरा मानना है भाजपा को इस बात पर चिंतन-मनन करना चाहिए।

2027 के चुनाव पर नही होगा कोई असर

2020 में भी सपा के बैनर से आशुतोष सिन्हा जीते थे और लाल बिहारी यादव निर्दल जीते थे। बाद में लाल बिहारी ने सपा जॉइन कर लिया था। लेकिन 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में इसका कोई खास असर नहीं हुआ था। भाजपा ने 250 से ज्यादा सीट जीत कर दुबारा अपनी सरकार बनाई थी। ऐसे में इन दो सीटों को 403 विधानसभाओं का सेमीफाइनल मानना थोड़ा अपरिपक्व विश्लेषण होगा।

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