बीएचयू को मिला ₹5 करोड़ का शोध अनुदान, PKDL के इलाज के लिए विकसित होगी नई चिकित्सीय फॉर्मूलेशन

PKDL treatment

वाराणसी, 8 अक्टूबर 2026। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) को चिकित्सीय अनुसंधान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि मिली है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), नई दिल्ली ने पोस्ट-कालाजार डर्मल लीशमैनियासिस (PKDL) के प्रभावी उपचार और नियंत्रण के लिए बीएचयू को ₹5 करोड़ का शोध अनुदान स्वीकृत किया है। इस परियोजना के तहत बीएचयू को राजेंद्र मेमोरियल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च (RMNIHR), पटना के सहयोगी सेंटर फॉर कोलैबोरेटिव रिसर्च (CCR) के रूप में चयनित किया गया है।

यह शोध परियोजना बीएचयू वाराणसी, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU), लखनऊ और RMNIHR पटना के बीच रणनीतिक सहयोग के तहत संचालित होगी। इसका मुख्य उद्देश्य PKDL के बेहतर उपचार और प्रबंधन के लिए एक नई चिकित्सीय फॉर्मूलेशन विकसित करना और उसका मूल्यांकन करना है।

त्वचा के घावों और रंगत में सुधार पर फोकस

पोस्ट-कालाजार डर्मल लीशमैनियासिस कालाजार के बाद होने वाली एक महत्वपूर्ण त्वचा संबंधी समस्या है। प्रस्तावित शोध के माध्यम से ऐसी चिकित्सीय व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया जाएगा, जो त्वचा पर होने वाले घावों के प्रभावी उपचार के साथ-साथ त्वचा के सामान्य रंग की पुनर्बहाली में भी मदद कर सके।

BHU
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बीएचयू के अनुसार, यह शोध पहल उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों के लिए नए उपचार विकल्प विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। परियोजना से न केवल संभावित चिकित्सीय समाधान विकसित होने की उम्मीद है, बल्कि अनुवादात्मक अनुसंधान, युवा वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण और शोध क्षमता निर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा।

प्रो. राकेश कुमार सिंह करेंगे परियोजना का नेतृत्व

इस शोध केंद्र का नेतृत्व प्रो. राकेश कुमार सिंह, विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर, जैव रसायन विभाग, विज्ञान संस्थान, बीएचयू करेंगे। वह सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च (CAR) अनुदान के प्रधान अन्वेषक (PI) होंगे।

परियोजना में विभिन्न संस्थानों के बहुविषयक विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। इनमें डॉ. कृष्णा पांडेय, निदेशक, RMNIHR पटना; प्रो. पी.एस. रजनीकांत, वैज्ञानिक, BBAU लखनऊ; तथा RMNIHR पटना के वैज्ञानिक डॉ. आशीष कुमार, डॉ. ऋषिकेश कुमार और डॉ. कुमार अभिषेक शामिल हैं।

बीएचयू को मिला यह शोध अनुदान विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक विशेषज्ञता और अनुसंधान क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ कालाजार और PKDL जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए नए चिकित्सीय उपाय खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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