BHU International Seminar: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में जेंडर (लिंग) से जुड़े सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पहलुओं पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। संगोष्ठी का विषय ‘जेंडर इन फ्लक्स’ (Gender in Flux) रखा गया है। इसमें विशेषज्ञों ने भारतीय सभ्यता, ज्ञान परंपरा और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में महिला-पुरुष संबंधों, समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारियों पर अपने विचार साझा किए।
संगोष्ठी में मुख्य वक्तव्य देते हुए पद्मश्री प्रो. निवेदिता रघुनाथ भिड़े, अखिल भारतीय अध्यक्ष, विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी ने कहा कि जेंडर से जुड़े प्रश्नों को भारतीय सभ्यतागत दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने मानव विकास को केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और बाहरी उपलब्धियों तक सीमित मानने के बजाय चेतना के विकास और संपूर्ण सृष्टि के साथ एकात्मता की भावना से जोड़कर देखने पर जोर दिया।

मानव विकास का आधार है चेतना और एकात्मता
प्रो. निवेदिता भिड़े ने भारतीय चिंतन परंपरा में परस्पर जुड़ाव, संबंध और निर्भरता की अवधारणा को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की आकांक्षाओं और सामूहिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। समाज में प्रत्येक व्यक्ति का विकास तभी सार्थक हो सकता है, जब वह व्यापक सामाजिक और मानवीय हितों से जुड़ा हो।
महिला और पुरुष के संबंधों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों के रिश्ते को प्रतिस्पर्धा या विरोध के रूप में देखने के बजाय पूरकता के दृष्टिकोण से समझना चाहिए। भारतीय दर्शन में आत्मा यानी ‘आत्मन’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आत्मा लिंग आधारित भेदों से परे है।

उन्होंने कहा कि बदलती परिस्थितियों के अनुसार सामाजिक व्यवस्थाओं में भी बदलाव जरूरी है। वर्तमान समय में परिवारों की संरचना और कार्यशैली में आए बदलावों को देखते हुए आपसी संवेदनशीलता और साझा जिम्मेदारियों को अपनाना चाहिए। जेंडर और इंटरसेक्शनैलिटी के सवालों पर विचार करते समय व्यक्ति की गरिमा, पसंद की स्वतंत्रता, सामाजिक संबंधों और सेवा भाव को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
भारतीय ज्ञान परंपरा से समझें जेंडर के सवाल: प्रो. कपिल कपूर
संगोष्ठी को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए पद्मभूषण प्रो. कपिल कपूर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर ने ‘जेंडर इन फ्लक्स’ विषय को समकालीन समय के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने ज्ञान प्रणालियों के गहन उपनिवेशमुक्तिकरण (डिकॉलोनाइजेशन) की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार सामाजिक प्रश्नों का अध्ययन भारतीय बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपराओं के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

उन्होंने पश्चिमी और भारतीय ज्ञान परंपराओं के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए भारतीय सभ्यता में नारी शक्ति और स्त्री दैवीय स्वरूप की केंद्रीय भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में व्यक्ति की गरिमा को केवल उसके लिंग के आधार पर निर्धारित नहीं किया जाता।

गार्गी, मैत्रेयी और अहिल्याबाई के योगदान का किया उल्लेख
प्रो. कपिल कपूर ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों, महाकाव्यों और ऐतिहासिक परंपराओं के संदर्भ में भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति और योगदान पर चर्चा की। उन्होंने गार्गी, मैत्रेयी और अहिल्याबाई होल्कर जैसी महान महिलाओं के उदाहरण देते हुए भारतीय इतिहास में महिलाओं की बौद्धिक, सामाजिक और प्रशासनिक भूमिका को रेखांकित किया।

उन्होंने महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के संदर्भ में ‘स्त्रीधन’ जैसी पारंपरिक अवधारणा का भी उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने आगाह किया कि पश्चिमी देशों के ऐतिहासिक अनुभवों से विकसित अवधारणाओं को भारतीय समाज पर बिना समुचित अध्ययन के लागू नहीं करना चाहिए। जेंडर संबंधों को भारत की अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं के संदर्भ में समझना जरूरी है।
तीन दिनों तक जेंडर के विभिन्न पहलुओं पर होगा मंथन

तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय संदर्भ में जेंडर के ऐतिहासिक विकास, वर्तमान स्वरूप और भविष्य की संभावनाओं का अकादमिक अध्ययन करना है। इसमें विकास, इंटरसेक्शनैलिटी और जेंडर अध्ययन के नए दृष्टिकोणों पर विशेषज्ञ विचार-विमर्श कर रहे हैं। संगोष्ठी के माध्यम से जेंडर से जुड़े विषयों को भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन सामाजिक बदलावों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया जा रहा है।
