वाराणसी में भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला के संगम का एक अनूठा दृश्य देखने को मिला। अवसर था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के महिला महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का, जिसका केंद्रीय विषय ‘मध्यकालीन हिंदी साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाएँ : परंपरा और निरंतरता’ था। इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य मध्यकालीन हिंदी साहित्य के विविध स्वरूपों और प्रदर्शनकारी कलाओं के अंतर्संबंधों पर विमर्श करना तथा भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता को समझना रहा। इस महत्वपूर्ण आयोजन के दौरान प्रो. उर्वशी गहलोत की पुस्तक ‘रीतिकाव्य रंजनी’ का लोकार्पण भी किया गया।

साहित्य और कला के समन्वय को समझना आवश्यक: कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं के बीच गहरा समन्वय है, जिसे शोध के माध्यम से समाज के सामने लाना आज की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि शोधकर्ताओं ने इन परंपराओं का गहन अध्ययन न किया होता, तो हमारी संस्कृति के कई महत्वपूर्ण सूत्र अनछुए रह जाते। उन्होंने युवाओं और शोधार्थियों से केवल मंच पर होने वाली चर्चाओं तक सीमित न रहकर विशेषज्ञों के साथ गहन संवाद स्थापित करने की प्रेरणा दी।
कबीर और तुलसी जैसे संत कवियों की रचनाएँ आज भी प्रासंगिक: डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, भारत सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने मध्यकालीन हिंदी साहित्य को महज़ एक कालखंड मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि कबीर, तुलसी, सूर और मीरा जैसे संतों की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनमें भक्ति, लोकजीवन, आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं का व्यापक समावेश है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “परंपरा केवल पुस्तकों में संजोकर रखने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसमें नई पीढ़ी तक अपने विचारों और मूल्यों को पहुँचाने का सामर्थ्य होना चाहिए।” उन्होंने काशी को भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत केंद्र बताया।
संत साहित्य और संगीत के अंतर्संबंधों पर चर्चा
विशिष्ट अतिथि, पद्मश्री से सम्मानित प्रो. मंगला कपूर ने मध्यकालीन संत साहित्य और संगीत के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हवेली संगीत की परंपरा को भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बताते हुए ध्रुपद और धमार जैसी शास्त्रीय संगीत शैलियों की विशेषताओं को रेखांकित किया। वहीं, यूजीसी-मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र के निदेशक प्रो. आनंदवर्धन शर्मा ने अपने बीज वक्तव्य में भक्ति आंदोलन को मात्र एक धार्मिक या साहित्यिक आंदोलन न मानकर एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

विद्वानों के सत्र और सांगीतिक प्रस्तुतियाँ
उद्घाटन सत्र का सफल संयोजन प्रो. उर्वशी गहलोत ने किया, जबकि स्वागत वक्तव्य प्राचार्या प्रो. रीता सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शोभित कुमार तिवारी ने दिया।
दो दिवसीय इस आयोजन में कई अकादमिक सत्रों की रूपरेखा तैयार की गई है:
- प्रथम अकादमिक सत्र: ‘मध्यकालीन साहित्य : विविध स्वरूप’ विषय पर आधारित इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. आशा यादव ने की, जिसमें देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और संस्थानों से आए आचार्य व वक्ता अपने विचार रख रहे हैं।
- द्वितीय अकादमिक सत्र: ‘मध्यकालीन साहित्य : सांगीतिक प्रस्तुति’ पर केंद्रित है, जिसमें महिला महाविद्यालय के संगीत विभाग की प्रो. ऋचा कुमार द्वारा विशेष गायन प्रस्तुति दी जा रही है।
यह राष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल साहित्य और कलाओं के परस्पर संबंधों को गहराई से समझने का माध्यम बन रही है, बल्कि युवा शोधकर्ताओं को भारतीय सांस्कृतिक विरासत की समृद्धि और उसकी निरंतरता पर संवाद करने का एक बेहतरीन मंच भी प्रदान कर रही है।
