अलविदा नाना पाटेकर! काशी से जुड़ा था गहरा नाता, ‘आंच’ से शुरू हुआ था बनारस कनेक्शन

वाराणसी। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर और काशी का रिश्ता सिर्फ फिल्मों की शूटिंग तक सीमित नहीं रहा। पिछले करीब दो दशकों में वाराणसी से जुड़े उनके कई ऐसे प्रसंग सामने आए हैं, जिनमें फिल्म, इंसानियत, परिवार, मृत्यु और आध्यात्मिकता के अलग-अलग पहलू दिखाई देते हैं। नाना खुद को पारंपरिक अर्थों में धार्मिक नहीं मानते, लेकिन ईश्वर में विश्वास और इंसानियत को महत्व देने की बात कह चुके हैं।

बनारस में शुरू हुई कहानी, मुंबई पहुंची और फिर ‘मैं जिंदा हूं’ की जंग बनी

वर्ष 2000 में नाना पाटेकर फिल्म ‘आंच’ की शूटिंग के लिए वाराणसी के चौबेपुर क्षेत्र के छितौनी गांव पहुंचे थे। शूटिंग के सिलसिले में नाना कई दिनों तक गांव में रहे। इसी दौरान उनकी मुलाकात गांव के रहने वाले संतोष मूरत सिंह से हुई। रिपोर्टों के मुताबिक, संतोष ने नाना के लिए अपने हाथ से लिट्टी और साग बनाया। नाना को उनका बनाया खाना पसंद आया और दोनों के बीच आत्मीयता बढ़ी।

इसके बाद नाना पाटेकर संतोष को अपने साथ मुंबई ले गए, जहां संतोष ने उनके घर पर रसोइये के तौर पर काम किया। कुछ रिपोर्टों में संतोष के नाना के लिए कुक के साथ-साथ ड्राइवर का काम करने का भी उल्लेख मिलता है। यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी कल्पना शायद संतोष ने भी नहीं की होगी।

मुंबई में शादी और फिर गांव लौटने पर बदली जिंदगी

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई में रहते हुए संतोष ने एक महाराष्ट्रीयन दलित युवती से शादी कर ली। जब वह पत्नी के साथ अपने गांव लौटे तो उन्हें परिवार और गांव के लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। कुछ रिपोर्टों में जातीय विरोध को इस विवाद की प्रमुख वजह बताया गया है।

इसके बाद संतोष दोबारा मुंबई चले गए। इसी दौरान उनके मुताबिक, उनके रिश्तेदारों ने उनकी गैरमौजूदगी का फायदा उठाया और उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित करा दिया। उनकी पैतृक जमीन पर भी कब्जा कर लिया गया। अलग-अलग रिपोर्टों में जमीन का क्षेत्रफल करीब 12 से 12.5 एकड़ बताया गया है।

संतोष के अनुसार, उनकी मृत्यु की कहानी को इस तरह दर्ज कराया गया कि उनकी तेरहवीं तक कर दी गई। जब उन्हें इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने गांव पहुंचकर खुद को जीवित साबित करने की कोशिश की। लेकिन समस्या यह थी कि सरकारी रिकॉर्ड में वह पहले ही ‘मृत’ हो चुके थे।

‘आंच’ की शूटिंग में मिला संतोष, आगे की कहानी ने सबको चौंकाया

इसके बाद संतोष ने अपनी लड़ाई को एक अलग तरीके से सामने रखा। उन्होंने गले में ‘मैं जिंदा हूं’ लिखी तख्ती टांगकर अधिकारियों और सरकार का ध्यान आकर्षित करना शुरू किया। वाराणसी से लेकर दिल्ली तक उन्होंने धरने और प्रदर्शन किए। जंतर-मंतर पर भी उन्होंने अपनी बात रखी और कई बार प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार लगाई।

दिलचस्प बात यह रही कि संतोष ने चुनाव भी लड़ा, जिसका उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं बल्कि अपनी पहचान और जीवित होने का दावा सरकारी रिकॉर्ड में साबित करना था। 2017 में उन्होंने शिवपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। चुनावी हलफनामे में भी उनका नाम दर्ज है।

जिसे कागजों में मृत बताया गया, वही निकला ‘मैं जिंदा हूं’ का योद्धा

सालों के संघर्ष के बाद 2019 में संतोष के मामले में बड़ा मोड़ आया। तत्कालीन वाराणसी जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह ने अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचकर जमीन की स्थिति देखी। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्व अधिकारियों की मौजूदगी में जमीन की नापी कराई गई और संतोष के हिस्से की जमीन को लेकर कार्रवाई की गई। सरकारी दस्तावेजों में भी उन्हें दोबारा ‘जिंदा’ दर्ज किए जाने की बात सामने आई।

इस पूरी कहानी में नाना पाटेकर की भूमिका मुख्य रूप से संतोष से मुलाकात और उन्हें मुंबई ले जाने तक स्पष्ट रूप से रिपोर्ट हुई है। बाद के वर्षों में संतोष ने नाना से मदद मिलने का भी दावा किया है; हालांकि उनकी जमीन और सरकारी रिकॉर्ड से जुड़ी पूरी कानूनी प्रक्रिया को नाना पाटेकर से जोड़ना उचित नहीं होगा।

यानी ‘आंच’ की शूटिंग से शुरू हुई यह कहानी सिर्फ एक अभिनेता और गांव के युवक की मुलाकात नहीं थी। यह आगे चलकर पहचान, जमीन, सरकारी रिकॉर्ड और अपने ही अस्तित्व को साबित करने के लिए एक व्यक्ति के लंबे संघर्ष की कहानी बन गई—जिसकी सबसे मार्मिक पंक्ति थी: ‘मैं जिंदा हूं।’

Nana Patekar
Nana Patekar

35 साल बाद फिर काशी पहुंचे नाना

नवंबर 2023 में नाना पाटेकर फिल्म ‘जर्नी’, जो बाद में ‘वनवास’ नाम से रिलीज हुई, की शूटिंग के लिए दोबारा काशी पहुंचे। अस्सी घाट पर फिल्म की शूटिंग के दौरान रामधुन, डमरू और मंजीरे के बीच नाना स्थानीय कलाकारों के साथ नजर आए। इस फिल्म के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय कलाकारों को भी जोड़ा गया था।

इस दौरान नाना ने कहा कि उन्होंने बनारस के बारे में बहुत कुछ सुना था, लेकिन इस बार वह वास्तव में ‘बनारस को महसूस’ कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि करीब 35 साल पहले भी वह शूटिंग के सिलसिले में बनारस आए थे।

मणिकर्णिका घाट ने छुआ जिंदगी का सबसे गहरा पहलू

नाना का काशी से जुड़ा सबसे भावनात्मक प्रसंग मणिकर्णिका घाट से सामने आया। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि वहां अंतिम संस्कार होते देख उनके भीतर जीवन और मृत्यु को लेकर कई विचार आए। उन्होंने अपने माता-पिता, भाई-बहनों और परिवार की उन पीढ़ियों को याद किया, जिन्हें वह खो चुके हैं।

यही वजह है कि नाना का काशी से रिश्ता केवल धार्मिक आस्था के रूप में देखना शायद सही नहीं होगा। उनके लिए काशी जीवन की वास्तविकता, मृत्यु, स्मृतियों और स्वीकार्यता से जुड़ा अनुभव भी रही है।

‘वनवास’ और काशी ने जोड़ी एक और कड़ी

फिल्म ‘वनवास’ में नाना ने उम्रदराज माता-पिता, परिवार से दूरी, अकेलेपन और रिश्तों की जटिलताओं से जुड़े किरदार को निभाया। फिल्म के विषय और नाना की अपनी जीवन-दृष्टि में भी कई समानताएं दिखाई देती हैं।

इस तरह नाना पाटेकर और काशी की कहानी को सिर्फ एक अभिनेता की धार्मिक यात्रा कहना अधूरा होगा। ‘आंच’ से लेकर ‘वनवास’ तक, अस्सी घाट से मणिकर्णिका तक—काशी उनके लिए कहीं न कहीं जिंदगी, रिश्तों, मृत्यु और इंसानियत को समझने की एक यात्रा बनती दिखाई देती है।

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