चंडीगढ़, 30 सितंबर 2026: कारोबार में उधार की रकम और भुगतान के लिए जारी किए गए चेक को लेकर हुए विवाद में चंडीगढ़ की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। मास क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड (Mass Crop Science Pvt. Ltd.) की शिकायत पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर स्थित एक कीटनाशक/पेस्टीसाइड विक्रेता को ₹37,67,778 की बकाया राशि के मामले में दोषी करार देते हुए सजा सुनाई है। मामला परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत दर्ज किया गया था।
क्या है पूरा मामला?
अदालत के सामने रखी गई शिकायत के मुताबिक, मास क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड की ओर से शाहजहांपुर में स्थित आरोपी विक्रेता को समय-समय पर पेस्टीसाइड और अन्य कृषि उत्पादों की आपूर्ति की गई थी। कंपनी का आरोप था कि सामान की आपूर्ति के बावजूद ₹37,67,778 की राशि का भुगतान नहीं किया गया।
बकाया भुगतान के लिए विक्रेता की ओर से कंपनी को एक चेक जारी किया गया। दस्तावेज के अनुसार, चेक नंबर 024646 की तारीख 29 अगस्त 2022 थी। यह चेक शाहजहांपुर के पुवायां स्थित यूनियन बैंक से संबंधित था।
कंपनी ने जब भुगतान के लिए चेक बैंक में लगाया तो उसे भुगतान नहीं मिला। 3 सितंबर 2022 को चेक ‘खाता ब्लॉक’ होने के कारण अनादरित (Dishonour) हो गया। इसके बाद कंपनी की ओर से आरोपी को कानूनी नोटिस भी भेजा गया।

नोटिस के बाद भी नहीं हुआ भुगतान
चेक बाउंस होने के बाद कंपनी की ओर से 23 सितंबर 2022 को कानूनी नोटिस भेजकर बकाया राशि का भुगतान करने की मांग की गई। शिकायत के अनुसार, नोटिस के बावजूद तय समय में राशि का भुगतान नहीं किया गया।
इसके बाद कंपनी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से सेल्स मैनेजर सुरिंदर कुमार ने दस्तावेजों के साथ अपना बयान दर्ज कराया।
अदालत ने साक्ष्यों पर किया विचार
अदालत ने शिकायतकर्ता की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों, चेक, बैंक रिकॉर्ड और कानूनी नोटिस समेत उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार किया। सुनवाई के दौरान आरोपी को नोटिस जारी किया गया और उसका पक्ष भी रिकॉर्ड पर लिया गया।
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम के तहत दोषी ठहराया। मामले में 30 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया गया।
कारोबारी लेन-देन में चेक की अहमियत
अदालत की टिप्पणी में कारोबारी लेन-देन में विश्वास और भुगतान की जिम्मेदारी के महत्व पर भी जोर दिया गया। फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि व्यापारिक लेन-देन में जारी किए गए चेक का भुगतान न करना गंभीर कानूनी परिणाम पैदा कर सकता है।
इस मामले में ₹37.67 लाख से अधिक की बकाया राशि, चेक के अनादर और उसके बाद कानूनी कार्रवाई ने पूरे विवाद को अदालत तक पहुंचाया। करीब चार साल तक चले घटनाक्रम के बाद अब अदालत ने आरोपी विक्रेता को दोषी करार देते हुए मामले में सजा सुनाई है।
