BHU में ‘भारतीय भावैक्य’ पर राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ, 24 से अधिक भाषाओं के 460 मुहावरों का होगा सत्यापन

वाराणसी, 27 अक्टूबर 2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) में भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक समानताओं और साझा भावनाओं को समझने के उद्देश्य से मंगलवार को तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। भारत अध्ययन केंद्र में आयोजित इस कार्यशाला का विषय ‘मुहावरों के माध्यम से भारतीय भावैक्य’ है।

इसमें 24 से अधिक भारतीय भाषाओं के 460 से अधिक मुहावरों का सत्यापन किया जाएगा। कार्यशाला का आयोजन कला संकाय के भाषाविज्ञान विभाग और भारत अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली के प्रायोजन से किया जा रहा है।

भारतीय भाषाओं में साझा भावनाओं की होगी पहचान

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित मुहावरों और मुहावरेदार अभिव्यक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन करना है। इसके माध्यम से भाषाओं में निहित समान भावनाओं, सांस्कृतिक अनुभवों और विचारों को समझने के साथ उनके बीच विद्यमान भावगत संबंधों की पहचान की जाएगी। आयोजकों के अनुसार, भाषाई विविधता के बावजूद भारतीय भाषाओं में अनेक सांस्कृतिक और भावनात्मक समानताएं देखने को मिलती हैं।

कार्यशाला के तीन दिवसीय अकादमिक विमर्श के आधार पर एक विशेष शोधग्रंथ यानी मोनोग्राफ तैयार किया जाएगा। इसका प्रकाशन भारतीय भाषा समिति द्वारा किया जाएगा। इसमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के मुहावरों का भाषाई और सांस्कृतिक विश्लेषण व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।

विविधता में ही विश्वविद्यालय की वास्तविक शक्ति : कुलपति

कार्यशाला में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित BHU के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अंतर्विभागीय संवाद और सहयोग के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। इसका बेहतर उपयोग तभी संभव है, जब विभिन्न विभागों और संकायों के बीच स्थापित सीमाओं से आगे बढ़कर सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।

उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रमों में अन्य विभागों के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सहभागिता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मुहावरों का अध्ययन केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, समाज, संस्कृति और कंप्यूटर विज्ञान जैसे विषयों के संदर्भ में भी किया जा सकता है।

भारतीय भाषाएं साझा सभ्यतागत विरासत की पहचान : प्रो. वारसी

मुख्य अतिथि प्रो. एम. जे. वारसी, अध्यक्ष, भाषाविज्ञान विभाग एवं लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ इंडिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने कहा कि भारत अनेक भाषाओं, बोलियों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से समृद्ध सभ्यता है। प्रत्येक भाषा की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तर पर उनमें गहरी समानताएं मौजूद हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए उन्होंने बहुभाषिकता को राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ और तमिल की ‘तोल्काप्पियम’ जैसी रचनाओं का उल्लेख करते हुए भारतीय भाषाओं की समृद्ध ज्ञान-परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाषाएं केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, संस्कारों, स्मृतियों और बौद्धिक विरासत की वाहक भी हैं।

नई पीढ़ी तक पहुंचें भारतीय भाषाओं के मुहावरे

कला संकाय की संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने मुहावरों के अध्ययन और उनके पुनर्स्मरण की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि अलग-अलग भाषाओं में मुहावरों की अभिव्यक्ति भले ही भिन्न हो, लेकिन उनमें निहित भावनाएं और संवेदनाएं कई स्तरों पर समान होती हैं। इन समानताओं को समझना भारतीय एकता को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।

कार्यक्रम में भारत अध्ययन केंद्र के समन्वयक एवं कार्यशाला के सह-संयोजक प्रो. शारदिन्दु कुमार तिवारी ने स्वागत भाषण दिया। स्थानीय समन्वयक डॉ. प्रवीण गटला ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यशाला के संयोजक एवं भाषाविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. अभिनव कुमार मिश्र सहित भारतीय भाषा समिति के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. पी. धनी कृष्णा, शोधार्थी, विद्यार्थी और अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

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