अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में जो विदेश नीति अपनाई है, उसी की वजह से विदेश मंत्री एस जयशंकर बार-बार उन्हें विदेश की धरती से आईना दिखा रहे हैं। भारत का यह स्पष्ट संदेत है कि मौजूदा जियोपॉलिटिक्स में अमेरिका उस तरह की पैंतरेबाजी करने की स्थिति में नहीं रह गया है, जो कुछ दशक पहले तक वह कूटनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता था।
रूस की दोस्ती से समझौता नहीं कर सकता भारत
पिछले करीब एक हफ्ते में ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिका और खासकर वहां के मौजूदा ट्रंप प्रशासन को जमीनी हकीकत समझाने की कोशिश की है। स्विटजरलैंड में म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान उन्होंने भारत और रूस के रिश्तों की गहराई का मुद्दा उठाकर अमेरिका को वास्तविकता बता दी है।
दुनिया में बदल चुकी है अमेरिका की हैसियत
यही नहीं, विदेश मंत्री ने बिना ज्यादा विस्तार में जाए चीन को लेकर अमेरिकी की हिलती-डुलती कूटनीति पर भी यह कहकर तीखा हमला किया कि ‘अमेरिका ने जानबूझकर खुद को अकेला कर लिया।’ उन्होंने कहा, ‘अमेरिका ने अपने रुख में बहुत बड़ा परिवर्तन किया है, उसने जानबूझकर खुद को अधिक अकेली शक्ति बनाया है..। चीन खुद को एक विशिष्ट देश के रूप में देखता है और वैश्विक स्तर पर दोनों के बीच काफी तीखी प्रतिस्पर्धा है।’

आतंकवाद के मुद्दे पर भी अमेरिका को दो टूक
इससे पहले अमेरिका में ही न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने आतंकी देश पाकिस्तान को लेकर अमेरिका को सुना दिया था। उन्होंने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर अमेरिका के आंखें मूंदे रहने पर एक तरह से चेतावनी देते हुए कह दिया कि ‘अगर मेरा साझेदार मेरी किसी मुख्य चिंता को पूरी तरह नहीं समझता है, तो इसका असर संबंधों पर भी पड़ सकता है।’
भारत की आक्रामक कूटनीति के 5 बड़े प्वाइंट
- अमेरिका को लेकर भारत की यह आक्रामक कूटनीति इस चीज का प्रमाण है कि यह आज भी रणनीतिक स्वायत्तता पर कायम है और उभरती हुई बहुध्रुवीय व्यवस्था में इसका अपना एक विशेष स्थान है।
- रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को याद दिलाकर भारत ने साफ कर दिया है कि इसके कूटनीतिक संबंधों में भी राष्ट्र हित सर्वोपरि है। अगर रूस हमारा सुरक्षा और ऊर्जा सहयोगी है, तो वह आगे भी बना रहेगा और सिर्फ किसी देश को यह पसंद नहीं आ रहा, इसके लिए वह अपने सामरिक हित को ताक पर नहीं रख सकता।
- भारत ने अमेरिका का साफ संदेश दिया है कि उसके साथ टेक्नोलॉजी, ट्रेड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आपसी सहयोग को महत्त्व देता है, लेकिन यह संबंध आपसी हितों पर ही टिके रहेंगे और बिना शर्त नहीं हैं।
- भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी वैश्विक गुटबाजी में फंसने से ज्यादा इसके लिए अपना राष्ट्र हित सबसे अहम है और उसपर किसी तरह के समझौते का सवाल ही नहीं है।
- भारत की ओर से यह एक वैश्विक एलान की तरह है कि अमेरिका और यूरोप के देशों के साथ उसके जितने भी व्यापार और सुरक्षा समझौते होंगे, वह पूरी तरह से पेशेवर होंगे।
